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रायबरेली के किले में दरार कभी हिट रहा बीएमडी का फार्मूला अब करवट बदल रहा समय

रायबरेली। उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है।इस लोकसभा से सिर्फ 3 बार गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार की जीत हुई है। इस लोकसभा में गांधी परिवार का दबदबा रहा है।फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी ने संसद में रायबरेली का प्रतिनिधित्व किया है।पिछले 20 साल से सोनिया गांधी इस सीट से सांसद हैं।

रायबरेली लोकसभा में चुनावी जंग हमेशा दिलचस्प रही है।रायबरेली में किसी भी चुनाव में त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय मुकाबला नहीं हुआ।लोगों में इसकी चर्चा नहीं रही और न ही इसकी चिंता ही दिखाई दी।यहां हर बार जो चुनावी मैदान में उतरा वो कांग्रेस से ही उतरा। रायबरेली में पंजे आगे हर लहर आकर थम गई।बड़ा सवाल यह है कि आखिर रायबरेली में ऐसा क्या है कि चुनावी जंग दो के बीच ही होती है।इसका कारण है वोट बैंक पर पकड़ के साथ चुनाव मैदान में चली जाने वाली सधी चाल।

इस रणनीति का श्रेय इंदिरा गांधी को जाता है। इंदिरा गांधी जब 1967 में पहली बार चुनाव मैदान में उतरीं तो रायबरेली की नब्ज टटोलना शुरू किया।अपने राजनीतिक गढ़ को अभेद्य बनाने के लिए कुशल रणनीतिकार की तरह इंदिरा गांधी ने ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित (बीएमडी)वोटबैंक के फार्मूले का उपयोग किया और बड़े अंतर से जीत दर्ज की। रायबरेली के चुनावी मैदान में बीएमडी का फार्मूला हिट रहा, लेकिन अब रायबरेली में यह मजबूत किला दरक रहा है।

मुलायम सिंह यादव के फार्मूले से रायबरेली में समाजवादी पार्टी की यादव,अन्य पिछड़ा, मुस्लिम और क्षत्रिय वोटरों पर पकड़ बननी शुरू हुई,जिसका असर 1991 के लोकसभा चुनाव में नजर आया।जनता दल का अंत हो चुका था और सपा का उदय हुआ था। सपा ने इस चुनाव में क्षत्रिय अशोक कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया।कांग्रेस ने शीला कौल को उम्मीदवार बनाया। दोनों में भीषण चुनावी जंग हुई। शीला कौल 3917 मतों से विजय प्राप्त की।पराजय के बाद भी सपा ने कांग्रेस के बीएमडी फार्मूले को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।यह चुनाव उस समय हुआ था जब राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी और राम मंदिर आंदोलन चरम पर था।

जातीय समीकरण को देखा जाए तो रायबरेली में अनुसूचित जाति के वोटर सबसे अधिक है।लगभग 34 फीसदी वोट के साथ यह वर्ग विजय दिलाने में अहम भूमिका निभाता है। दूसरे नंबर पर अन्य पिछड़ा वर्ग है। उम्मीदवार के किस्मत का फैसला करने में 23 फीसदी भूमिका इनकी रहती है।तीसरे नंबर पर ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण 11 फीसदी के साथ विजय को अंतिम टच देते हैं।समीकरणों को उलटने में छह फीसदी मुस्लिम भी अहम भूमिका निभाते हैं।

कांग्रेस के रणनीतिकारों ने 1967 में रायबरेली लोकसभा सीट के लिए होमवर्क किया तो जातीय समीकरणों का गुणा-भाग समझ आया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने ऐसा फार्मूला तैयार किया जो कांग्रेस के लिए रायबरेली ही नहीं बल्कि समूचा हिंदी बेल्ट भी जीतने का अमोघ अस्त्र बन गया। 

1989 में मुलायम सिंह यादव ने पिछड़ों और मुस्लिमों को साथ लेकर चलने का फैसला किया। यही वजह रही कि 1989 के लोकसभा चुनाव में जनता दल से चुनाव लड़े राजेंद्र प्रताप सिंह को 1,13,879 वोट मिले और कांग्रेस की शीला कौल को 1,97,658 वोट मिले।

1999 के चुनाव में भी सपा ने गजेंद्र सिंह को उम्मीदवार बनाया और कांग्रेस ने कैप्टन सतीश शर्मा को उम्मीदवार बनाया।प्रचार की बागडोर प्रियंका गांधी ने अपने हाथ में ली तो  लगभग 10 साल बाद परंपरागत वोटर को कांग्रेस की तरफ लौटा दिया।हालांकि चुनाव में कैप्टन 73,549 मतों से विजायी हुए।भाजपा उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। असल में कैप्टन सतीश शर्मा इंदिरा गांधी के साथ भी काम कर चुके थे, जिससे उनको रायबरेली के जातीय समीकरणों की अच्छी समझ थी। यही वजह से प्रियंका गांधी का चुनाव प्रचार बछरावां, हरचंदपुर, सतांव, रायबरेली और लालगंज में केंद्रित रहा।

2004 में सोनिया गांधी जब चुनावी मैदान में उतरीं तो सपा ने फिर दूसरा स्थान हासिल किया। सोनिया ने 2,49,765 वोटों विजय प्राप्त की।इसके बाद 2009, 2014 और 2019 के चुनाव में सपा ने कांग्रेस को वॉकओवर दिया और फिर कांग्रेस जीत हासिल करती रही, लेकिन 2019 के चुनाव में भाजपा ने जिस तरह टक्कर दी उसने कांग्रेस के रणनीतिकारों को चिंतित कर दिया। अब बसपा भी मशक्कत कर रही है। भाजपा जीत के लिए वोटरों को फिट करने में जुटी है।

रायबरेली लोकसभा में बछरावां, हरचंदपुर, रायबरेली, सरेनी और ऊंचाहार शामिल हैं। तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा और दो विधानसभा सीटों पर सपा के विधायक हैं। भाजपा के खाते वाली बछरावां से श्याम सुंदर, रायबरेली से अदिति सिंह और ऊंचाहार से मनोज पांडे को जीत मिली है,जबकि हरचंदपुर से सपा से राहुल राजपूत और सरेनी से देवेंद्र प्रताप सिंह ने जीत हासिल की है।

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