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हवा का रुख मोड़ने वाले इन दिग्गजों की इस चुनाव में खलेगी कमी इनके एक इशारे पर बदल जाता था मतदाताओं का मन

लखनऊ।लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को हो चुका है। दूसरे चरण का मतदान 26 अप्रैल को होगा।ऐसे में उत्तर प्रदेश की सियासत की बात करें तो यहां की सियासी जमीं पर कई ऐसे नेता हुए हैं, जो अपने दम पर हवा का रुख मोड़ने की ताकत रखते थे।यह ऐसे नेता थे जिनकी अपनी जाति में तो पकड़ थी ही, बल्कि इनके एक इशारे पर यूपी के मतदाताओं का मन बदल जाता था।

अफसोस की बात है कि उत्तर प्रदेश की सियासी जमीन से निकले और आसमां तक पहुंचने वाले कई चेहरे इस लोकसभा चुनाव में नहीं हैं।इनके नाम और काम पर वोट की फसल काटी जा रही है,लेकिन मतदाताओं को इनकी कमी खल रही। ये ऐसे चेहरे ऐसे थे जिन्हें देखने और सुनने के बाद मतदाता अपना इरादा तक बदल देते थे। ये नेता अब भले न हों, लेकिन इनके नाम से वोट का ग्राफ बदलता रहा है। जिनमें प्रमुख रूप से सपा संस्थापक मुलायम सिंह, भाजपा के दिग्गज नेता कल्याण सिंह, लालजी टंडन, रालोद के दिग्गज नेता अजित सिंह जैसे तमाम नेता।

ये दिग्गज सियासी हवा का रुख मोड़ने की ताकत रखते थे। यही कारण है कि चुनाव मैदान में उतरने वाले प्रत्याशी इन दिग्गजों का नाम,काम और अरमान के जरिए सियासी फसल लहलहाने की कोशिश करते हुए दिखाई दे रहे हैं। बरहाल इन दिग्गजों की के न रहने से यह सब कितना कारगर होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इन दिग्गजो के चाहने वाले आज भी हैं। इन दिग्गजों के चाहने वाले बैनर, पोस्टर और सोशल मीडिया पर इनकी तस्वीरों के साथ आपको नजर आ जाएंगे।

सियासी अखाड़े के बड़े खिलाड़ी समाजवादी पार्टी के संस्थापक धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की सियासत में लगभग पांच दशक तक अपनी जबरदस्त छाप छोड़ी।मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान दिया गया। मुलायम सिंह यादव ने अपने पहले चुनाव में आप मुझे एक वोट और एक नोट दें, अगर विधायक बना तो सूद समेत लौटाऊंगा का नारा दिया।मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री से लेकर रक्षामंत्री तक बने।सपा ही नहीं सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के नेता भी मुलायम सिंह यादव की सियासी दांवपेच के मुरीद रहे।

पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के लिए पिछड़ी जातियों की गोलबंदी की। सोशल इंजीनियरिंग के माहिर खिलाड़ी कल्याण सिंह ने मंडल बनाम कमंडल के दौर में तीन फीसदी लोध जाति को गोलबंद कर नए तरीके का माहौल तैयार किया। इसके बाद अन्य पिछड़ी जातियों को जोड़ने का अभियान चला। कल्याण सिंह राम मंदिर आंदोलन के नायक के रूप में उभरे।भाजपा के साथ पिछड़ी जातियों को गोलबंद कर कल्याण सिंह ने सियासत की ठोस बुनियाद तैयार की।

चौधरी अजित सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी से चंद कदम दूर रह गए थे।अजित सिंह बीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सरकार तक केंद्रीय मंत्री रहे। 1989 के चुनाव के बाद वीपी सिंह ने अजित सिंह को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान किया तो मुलायम सिंह यादव ने भी दावेदारी कर दी। विधायक दल की बैठक में महज पांच वोट से अजित सिंह हार गए और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

अमर सिंह का उत्तर प्रदेश की सियासत में बड़ा दखल रहा। 90 के दशक में सियासत में सक्रिय हुए अमर सिंह सपा के महासचिव बने और फिर 1996 में राज्यसभा सदस्य बन गए। छह जनवरी 2010 को अमर सिंह ने सपा से इस्तीफा दे दिया। साल 2011 में कुछ समय न्यायिक हिरासत में रहे और सियासत से संन्यास ले लिया।

अधिवक्ता से विधानसभा अध्यक्ष और फिर राज्यपाल की भूमिका निभाते हुए तमाम कड़े फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले केशरीनाथ त्रिपाठी भी इस चुनाव में नहीं दिखेंगे। लगभग 88 साल की उम्र में आठ जनवरी 2023 को केशरीनाथ त्रिपाठी निधन हो गया।

सुखदेव राजभर कांशीराम के साथ बहुजन समाज पार्टी की नींव रखने वालों में शामिल रहे। मुलायम सिंह यादव सरकार में सहकारिता राज्य मंत्री की सुखदेव राजभर ने जिम्मेदारी निभाई।वहीं मायावती सरकार में संसदीय कार्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका निभाई।

लालजी टंडन ने 1960 में पार्षद से सियासी सफर की शुरुआत की और राज्यपाल तक बने। विधान परिषद सदस्य, विधायक, मंत्री, सांसद, राज्यपाल तक लालजी टंडन ने काफी लंबी सियासी पारी खेली। लालजी टंडन लखनऊ की रग-रग से वाकिफ थे।

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